नहीं रहे बाई चाली सासरिए के कैमरामैन

नहीं रहे बाई चाली सासरिए के कैमरामैन

नहीं रहे बाई चाली सासरिए के कैमरामैन

नहीं रहे बाई चाली सासरिए के कैमरामैन
अपने ही सिनेमा के लोगों की नहीं रखते खबर, 25 दिन बाद पता चला इंडस्ट्री के लोगों को

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नहीं रहे बाई चाली सासरिए के कैमरामैन
एमडी सोनी 

एमडी सोनी
रोजाना दुनियाभर में हजारों लोगों को लील रहे कोरोना ने राजस्थानी सिनेमा इंडस्ट्री में भी सेंध मार ली। इसने राजस्थानी भाषा की सफलतम फिल्म बाई चाली सासरिए सहित सर्वाधिक फिल्मों को अपने कैमरे में उतारने वाले चंदू देसाई को अपना शिकार बना लिया। 11 जून को कोरोना के बहाने मौत दबे पांव आई और चंदू देसाई को अपने साथ ले गई। दुख की बात यह है कि इतने बड़े कैमरामैन के जाने की खबर एक-दो फेसबुक पोस्ट/पेज तक सिमटकर गई। मीडिया में उनके योगदान को याद करना तो दूर, कहीं उनकी चर्चा तक नहीं हुई! यहां तक कि राजस्थानी फिल्म इंडस्ट्री के भी ज्यादातर लोगों को उनकी मौत के 25 दिन बाद खबर मिली वो भी फिल्म क्रिटिक एमडी सोनी ने जब अपनी फेसबुक वॉल पर उनकी मौत का जिक्र किया। इस तरह हिंदी, राजस्थानी और गुजराती फिल्मों का अनुभवी, सिद्धहस्त और समर्पित सिनेमैटोग्राफर गुमनाम सा सदा के लिए विदा हो गया।

एम डी सोनी के अनुसार फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के दिलों में बसे चंदू देसाई को सब लोग प्यार से चंदूभाई ही कहकर पुकारते थे। वैसे उनका पूरा नाम था चंद्रकांत नर्मदाशंकर देसाई। भावनगर जिले के तलाजा गांव में पूजा-पाठ और पंडिताई करने वाले परिवार में पांच जुलाई 1945 को उनका जन्म हुआ, जबकि बचपन मुंबई में बीता। इंग्लिश मीडियम स्कूल से इंटर साइंस करने के बाद किशोर वय से वे सिनेमा से जुड़ गए। हिंदी और गुजराती फिल्मों में कैमरा असिस्टेंट बनकर सिनेमैटोग्राफी के गुर सीखने में जुट गए। नरोत्तम पटणी उनके गुरु रहे। उन्हीं की छत्रछाया में चंदूभाई को गुजराती फिल्म केसर चंदन (1986) में ब्रेक मिला। अपनी पहली स्वतंत्र फिल्म के लिए गुजरात राज्य सरकार फिल्म पुरस्कारों में बेस्ट सिनेमेटोग्राफर का अवॉर्ड जीतकर चंदू देसाई ने अपनी काबिलियत को साबित भी कर दिखाया।

नहीं रहे बाई चाली सासरिए के कैमरामैन

जाने-माने फिल्मकार मोहनसिंह-राठौड़, 1982 में वीर तेजाजी के ज़रिए चंदूभाई को राजस्थानी सिनेमा में लेकर आए. रामराज-जी नाहटा की इस फिल्म में मोहनजी प्रोडक्शन कंट्रोलर थे और चंदूभाई कैमरा असिस्टेंट। मोहनसिंहजी ने ही उन्हें अपने होम प्रोडक्शन की पहली फिल्म देराणी जेठाणी (1985) में उन्हें रिपीट किया। राजस्थानी और गुजराती में बनी इस फिल्म में छाया निर्देशक अरविंद दवे के सहायक के रूप में चंदूभाई ने लाइटिंग की अहम ज़िम्मेदारी संभाली। चंदूभाई का काम, समझ और डेेडिकेशन देखकर मोहनजी ने अपने परम मित्र, गुणी राइटर केशव-जी राठोड़ रचित ब्लॉकबस्टर फॉर्मूले पर बनाई अपनी दूसरी राजस्थानी फिल्म बाई चाली सासरिये (1987) में चंदूभाई को इंडिपेंडेंट चांस दिया और बॉक्स ऑफिस पर इस बाई ने इतिहास बना दिया। यहीं से मोहनजी और चंदूभाई की कैमिस्ट्री ऐसी जमी कि लगातार 12 राजस्थानी फिल्मों में जुगलबंदी की मिसाल बन गई!

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नीलू के साथ राकेश रोशन स्टारर रमकूड़ी झमकूड़ी, कुलभूषण खरबंदा की केंद्रीय भूमिका वाली दादोसा री लाडली, भोमली, लिछमी आई आंगणै, गोविंदा के आइटम सॉन्ग वाली बीरा बेगो आईजे रे, असरानी की कॉमेडी से भरी जियो म्हारा लाल, अरुण गोविल अभिनीत देव, प्राण की अदाकारी से सजी बेटी हुई पराई रे जैसी राजस्थानी फिल्मों के अलावा मोहनजी ने जब राजश्री बैनर की हिंदी फिल्म हम प्यार तुम्हें से कर बैठे (2002) का लेखन-निर्देशन किया, तो उसमें भी चंदूभाई को सैकंड यूनिट कैमरामैन बनाकर अपने साथ रखा। चंदू देसाई ने भरत नाहटा की बीनणी(1992), श्यामसुंदर जालानी की द्विभाषी बाबा रामदेव (1994) सहित छह अन्य राजस्थानी फिल्मों को भी अपने फऩ से सजाया, संवारा।

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उधर, गुजराती फिल्मों का सिलसिला भी साथ-साथ ज़ारी रहा- पानेतर, साजणने सथवारे, भादरने कांठे, मानवीनी भवाई, लाखो वणजारो, रसियो वालम, माडी जाया नु मामेरूं, पानेतर नो रंग, प्रतिज्ञा, ओ हो केटलो सारो मारो वर, वागी प्रेम कटारी, राज रतन।
मानवीनी भवाई (1993) और राज रतन (1999) के लिए भी का श्रेष्ठ छायाकार का गुजरात राज्य सरकार फिल्म पुरस्कार हासिल करके चंदूभाई ने अपनी गुजराती फिल्म इंडस्ट्री में अपना रुतबा बुलंद किया।
पन्नालाल पटेल की ज्ञानपीठ सम्मानित कृति पर उपेंद्र त्रिवेदी स्टारर मानवीनी भवाई में चंदूभाई ने सूखा और अकाल की त्रासदी को अपने कैमरे के जरिए पर्दे पर इतने नैचुरल तथा असरदार ढंग से उजागर किया कि गुजरात के सिनेमा दिग्गजों ने भी उनकी दक्षता का लोहा माना।

रीजनल सिनेमा में बिजी रहने से हिंदी की गिनी-चुनी फिल्में ही चंदूभाई के हिस्से में आईं। हां, इस दौरान धीरज कुमार के अदालत और पी. कुमार वासुदेव के गणदेवता जैसे चार-पांच चुनिंदा टीवी धारावाहिकों में भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी। गणदेवता के नैसर्गिक नजारे और माटी में रचे-बसे किरदार, छोटे पर्दे के प्रबुद्ध रसिकों को जरूर याद होंगे!

पर्दे पर भी आए नजर

बहुत कम लोग जानते होंगे कि हमेशा पर्दे के पीछे रहने वाले चंदूभाई दो बार पर्दे पर भी नजर आए। सुभाष शाह निर्देशित गुजराती फिल्म वट वचन ने वेर (1982) में पंडित शिष्य भीमशंकर का रनिंग रोल निभाया (देखें- इमेज), जबकि कुछ फिल्मों में कैमियो भी किए।

इस तरह बने सबके चहेते

तकनीकी शिक्षा,… सिनेमैटोग्राफी के तीनों पक्षों- छाया निर्देशन, कैमरा परिचालन और लाइटिंग में निपुणता,… नरोत्तम पटणी, अर्जुन देसाई, अरविंद दवे, मुकुंद पाठारे, जे.पी. साहनी(सोनी) और नरेंद्र मिस्त्री से गृहण किए सिनेमैटोग्राफी के गुर,… बाबूभाई मिस्त्री से सीखे ट्रिक फोटोग्राफी के टिप्स,… अपने काम के प्रति लगन, समर्पण, ईमानदारी और बिना लालच/सुविधा शर्तों के काम करने की फितरत… इन तमाम ख़ूबियों ने चंदूभाई को ऊंचे मुकाम पर बिठाया। फिल्मकारों का चहेता बनाया। गुजराती सिनेमा के कामयाब डायरेक्टर सुभाष जे शाह की जेडी मजीठिया अभिनीत गुजराती फिल्म पहली प्रीत नो पहलो फागण (2004) के बाद चंदूभाई ने इंडस्ट्री से विदाई ले ली, लेकिन आठ साल के अंतराल के बाद, मोहनसिंह राठौड़ ने जब अपनी राजस्थानी औलाद (2013) के लिए याद किया, तो उन्होंने इसे स्वीकार कर दोस्ती का फर्ज निभाया।

चंदू भाई मेरी आंखें थीं: मोहन सिंह राठौड़

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राजस्थानी सिनेमा के स्टार डाइरेक्टर मोहन सिंह राठौड़ ने उन्हें याद करते हुए लिखा-चंदू भाई मेरी आंखें थीं। मुझे लगता है अब मेरी रोशनी कमजोर हो गई। शूटिंग में हमारी कभी कभार बहस हो जाया करती थी, लेकिन कभी मनमुटाव नहीं हुआ। रात में थका हारा पूरा यूनिट सो जाता था, लेकिन मैं और चंदू भाई जागकर अगले दिन की शूटिंग की तैयारी मैं विचार विमर्श करते रहते। मुश्किल से हम 4 या 5 घंटे सोते थे। शूटिंग के दौरान लोकेशन पर कभी-कभी तो मैं कुर्सी पर बैठकर 2-4 मिनट झपकी ले लेता था… चंदू भाई लाइटिंग में लग जाते थे। मुझे सोया देखकर वह मुझे नहीं उठाते थे, लेकिन अचानक मेरी आंख खुलती तो मैं उससे क्षमा मांगता था। क्योंकि डायरेक्टर फिल्म का कैप्टन होता है उसको सेट पर सोने का अधिकार नहीं। ऐसा करते करते हमें एक डेढ़ महीना गुजारना पड़ता है। शूटिंग के दिनों में हमारा सबसे मुश्किल दौर वही होता था। ना खाने की परवाह, ना सोने का वक्त। बस काम.. काम…। मेरी फिल्म में कलाकार बदलते रहते थे, लेकिन यूनिट मेंबर सदा वही रहते थे जिन्होंने मेरे सुख दुख में मेरा साथ दिया…. चंदू भाई को श्रद्धांजलि के साथ मेरा सलाम… ईश्वर उनके परिवार को साहस और हिम्मत प्रदान करें….

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